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दो महिलायें बात करते हुए –

अनीता– आपकी बेटी क्या करती है?

रीना-(गर्व से)वो एक बहुत ही जानी मानी कंपनी में काम करती है और वह अच्छे-खासे पैसे भी कमा लेती है।

अनीता– ये तो बहुत अच्छी बात है! आपको उसपर बहुत अभिमान होना चाहिए। दूसरे तरह मेरी बेटी को देखिए! इतनी अच्छी एजुकेशन देने के बाद भी वह काम करने के लिए तैयार नहीं है।

रीना– अच्छा! इसका मतलब उसकी पढाई का कोई मतलब नहीं रहा।

अनीता – हाँ, हमने बहुत कोशिश की उसको समझाने की पर वो समझने को तैयार ही नहीं है। वह कहती है कि वह अपने घर में अपने पति और उनके परिवार में बहुत खुश है। उसको बहार काम करने में वो ख़ुशी नहीं मिल रही है। जी हाँ , यह एक बहुत ही शर्मनाक बात है। जब हमारे सारे रिश्तेदार उसके बारे में पूछते हैं तो मैं कुछ भी बोलके बात टाल देती हूँ।

उससे कम पढ़ी लड़कियां काम पर जाती हैं पर वो नहीं।

 

रीना– मेरी बेटी काफी होशियार है। उसको काम और घर, दोनों एक साथ संभालना आता है। मैं गर्व के साथ सबको उसके गुण बताती हूँ।

अनीता– (उदास चेहरे के साथ ) हम्म!

क्या आप कभी ऐसी दुविधा के करीब भी आयी हैं? हम आपको बहुत सारे ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ औरतो को ऐसी स्तिथि से गुज़ारना पड़ता है जहाँ लोग उनपे दबाव डालते हैं कि वह काम पर क्यों नहीं जा रही है?

कुछ सालों पहले हमारे देश में, औरतो का घर से बहार निकलकर काम करना एक बहुत बड़ी बात थी। और जो ऐसा करती थीं उन्हें मॉडर्न , पॉश या विरोधी कहा जाता था। फिर वक़्त बदला और लोगों की सोच भी। उप्पर मिडिल क्लास परिवार ये मानने लग गए कि पढ़ाई जीवन का अहम् हिस्सा है। खासकर लड़कियों के लिए। परिणामस्वरूप पढ़ाई का स्तर लड़कियों के लिए बढ़ गया। आज हमें कई पढ़ी-लिखी, ऊँचे पद पर महिलाएं मिलेंगी और पूरी दुनिया को उनपर गर्व भी होगा।

लेकिन यहाँ कुछ ऐसे महिलाएं भी हैं जो ऐसे तो बहुत शिक्षित हैं, लेकिन उन्होंने बहुत ऊँचा करियर नहीं चुना। इनको ‘नॉन वर्किंग वूमन’ कहा जाता है। (ऐसा नहीं है की वो काम नहीं करतीं। वह काम करती हैं, लेकिन निराशा की बात है कि उनके काम से पैसे नहीं बनते और इसलिए उनके काम की कोई मान्यता नहीं होती।)

ऐसी महिलाओं की ज़िन्दगी भी आसान नहीं होती। उनको उनके निर्णय के लिए काफी कोसा जाता है, वो भी खुद के माता पिता और कई बार परिवार के सदस्यों के द्वारा। वह उनसे ऊँचे करियर की उम्मीद रखते थे और फिर उन्हें घर में देख वो उनसे निराश हो जाते हैं। ऐसी महिलाओं को अपने माँ बाप का मान न रखने के लिए भी कोसा जाता है। हैरानी की बात है ना?

हालाँकि, मेरे लिए यह जजमेंट बिल्कुल सही नहीं है। माँ-बाप का अपने बच्चों से उम्मीद रखना 100% सही है पर इसका मतलब यह नहीं की वह बच्चे को, अपने मान के लिए, काम करने पर मजबूर करें जबकि वो यह नहीं चाहते हैं।

काम पर जाना या नहीं जाना, यह उनका खुद का निर्णय है और कहीं से यह परिवार के मान पर असर नहीं डालता है। किसी को हक़ नहीं है उनको सवाल करने का। शिक्षा का, एक स्त्री के जीवम में, काम पर जाने से या अच्छा करियर बनाने से कहीं बड़ा महत्व है। उसका उद्देश्य संपूर्ण विकास है न की सिर्फ करियर का विकास। शिक्षा स्त्री को ज़िन्दगी में सही और गलत के मायने सिखाती है, उनमें फर्क करना सिखाती है। उनकी शिक्षा उनके क़रीबिजनों के लिए भी उतनी महत्वपूर्ण है। एक शिक्षित स्त्री अपने पूरे घर और समाज के लिए बहुत बड़ा गर्व होती है, इससे परे की वह काम पर जाती है या नहीं।

इसके अलावा लोग ऐसा कैसे बोल सकते हैं कि एक “काम पर नहीं जाने वाली औरत बस घरपर बैठी रहती हैं”? हम मानते हैं कि घर के कामों से पैसे नहीं आते, पर आप ही सोचिये, क्या यह काम भी कहीं से भी बहार वाले कामों से कम योग्य है? अगर क्या एक महिला को घर पर सबका ख्याल रखना पसंद है या अपने शौक पूरे करना या घर से काम करना पसंद है, तो इसमें कुछ गलत है?

क्या हम ऐसी महिलाओं के निर्णय को उतना ही सम्मान नहीं दे सकते? उन्हें अपना फ़ैसला लेने की आज़ादी नहीं दे सकते? बल्कि, हमें तो ऐसे निर्णयों को और सराहना चाहिए की उन्होंने इतना बड़ा त्याग करके अपने परिवार की खैरियत को चुना है।

जब तक वह खुश है अपने इस निर्णय से और एक खुशहाल ज़िन्दगी जी रही हैं, तब तक, यकीन मानिये, कुछ और मायने नहीं रखता।

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