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जी हाँ। पर इसका मतलब यह नही कि आप हरदम मुस्कुराती ही रहें। क्योंकि शिशु का अन्य भावनाओं से परिचित होना भी ज़रूरी है। शिशु का आपकी फीलिंग्स समझना उसे उसके आस-पास के वातावरण से परिचित करेगा। उसे अपने भीतर के माहौल को समझने में मदद मिलेगी।

 

 क्या शिशु अपनी माँ  पहचानते हैं?

 

शोधकर्ताओं ने वैज्ञानिक खोजों में पाया है कि शिशु उनका बर्ताव अपने आस पास के लोगों को देख कर बदलते हैं। शिशु आपका चेहरा पहचानने में कुछ समय लेगा। और वह अन्य लोगों की शक्लें पहचानने की भी कोशिश करेगा। वह चेहरे के साथ-साथ उनके पीछे छिपे भावों को भी समझने की कोशिश करेगा।

शिशु माँ में क्या देखते हैं?

 

 

 

शिशु जब माँ का चेहरा देखते हैं तब वह उनके होंठ व आँखें पढ़ने की कोशिश करते हैं। यहीं से उन्हें भावों और भाषा की समझ मिलती है। यह ज़रूरी है की आप अपने चेहरे पर मधुर भाव रखें ताकि शिशु भी आरामदायक वातावरण का अनुभव करे। अगर आपके चेहरे पर कोई भाव नही दिखता तब शिशु निराश हो जाते हैं। इसलिए बच्चों का मन लगाने के लिए हर तरह के भाव उन्हें दिखाते रहें।

 

शिशु क्या बोली समझते हैं?

 

बच्चों को भाषा सिखाने के लिए आप उनकी तरफ देख कर बात करें। आप बात करते वक्त चेहरे पर अलग-अलग हावभाव तथा स्वर का प्रयोग करें। बच्चे से जल्दी जल्दी, रोते हुए, गुस्से से या दुःख से बात न करें। इससे बच्चे भयभीत या मौन हो जायेगा। आप ज़्यादा से ज़्यादा उसे खुशहाल माहौल में रखें।

 

शिशु को कैसे पकड़ें ?

 

 

 

अगर आप थकी हुई हैं तो 5 मिनट के लिए गहरी साँस लें। उसके पश्चात शिशु को अपनी गोद में उठायें। बच्चों को न ज़्यादा कस न ज़्यादा हलके से पकड़ें क्योंकि इससे शिशु का बदन भी प्रभावित होता है। उन्हें मद्धम ज़ोर से पकड़ें तथा हलके हाथों से सहलाएं। इससे उनके बदन को सुकून मिलेगा।

 

बच्चे से प्यार से बात करने से वह भी आपसे हँसते हुए पेश आएगा। अगर उसे आपका उसके साथ रहना आरामदाय लगत है तो वह आपको देख कर हाथ पैर मारेगा, हंसेगा, अपनी तोतली भाषा में माँ बोलने की कोशिश करेगा, आपकी गोद छोड़ने पर रुआँसा हो जायेगा और आपको कस कर पकड़ लेगा।

 

प्यार बांटने से बढ़ेगा तो क्यों न दिन के साथ-साथ ज़िन्दगी को भी खुशनुमा बनायें।

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