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कुछ देशों में बेबी शावर आने वाले या फिर पैदा हुए बच्चे की माँ को बधाइयाँ देने व बच्चे की सलामती और अच्छी सेहत के लिए मनाया जाता है। इसमें माँ को तोहफे दिए जाते हैं। कुछ परमपराओं में एक औरत का स्त्री से माँ बनने का सफर का जश्न मनाया जाता है। अलग अलग देशों में इसे अलग अलग नाम से बुलाया जाता है। इस पोस्ट में हम भारत के सन्दर्भ में बेबी शावर के बारे में बात करेंगे।

बेबी शावर नाम कहाँ से आया ?

बेबी शावर यानी गोद भराई का मतलब होता है माँ की गोद उपहारों से भर देना।

बेबी शावर की शुरुवात कैसे हुई

गोद भराई पारम्परिक तौर पर परिवार की पहली संतान के लिए मनाया जाता था। इसमें सिर्फ महिलाओं को आमंत्रित किया जाता था। पहले लोग घर के करीबी सदस्यों के साथ ही गोद भराई करते थे क्योंकि बाहरी लोगों से तोहफों की मांग करना अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु विभिन्न देशों की विभिन्न मान्यता के अनुसार इसे थोड़े अलग ढंग से मनाया जाता है। कभी कभी घर में बच्चे की नानी या दादी गोद भराई में मेहमान नवाज़ी करती हैं।

शुरुवात में भारत में गोद भराई कैसे मनाते थे ?

वेदों के समय से महिलाओं की गोद भराई की जाती थी। सीमंता नामक समारोह में औरतों को सूखे मेवे, मीठे चने खिलाये जाते थे और चूड़ी, कंगन, बिंदी उपहार स्वरुप दिए जाते थे। इस समारोह में शिशु के कान के विकास को ध्यान में रखते हुए एक विशेष प्रकार का संगीत आयोजन भी किया जाता था। इससे शिशु को मधुर संगीत सुनने को मिलेगा यह माना जाता था। सीमंता माँ और शिशु के स्वास्थ्य व सलामती के लिए मनाया जाता था।

भारत के विभिन्न हिस्सों में सीमंता को उसके स्थानीय नाम से बुलाया जाता है।

भारत के उत्तरीय राज्यों में सीमंता को गोद भराई के नाम से बुलाया जाता है।

महाराष्ट्र में सीमंता को दोहालजेवन कहते हैं।

पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में सीमंता को साधरोषी कहते हैं।

दक्षिण भारत जैसे की तमिल नाडु और आंध्रा प्रदेश में सीमंता को सीमन्थम / वलयकापु या पुछोत्तल बोला जाता है। कर्नाटका में सीमंता नाम बोला जाता है। दक्षिण भारत में सीमंता में औरतों को साड़ी , जेवर और फूलों की माला पहनाई जात्ती है। इसके साथ ही उसके लिए फूलों से सजा एक झूला भी डाला जाता है जिसमे वह झूल सके।

गुजरात में सीमंता को सीमंत या खोलो भर्यो कहते हैं। इसे 7 या 8 माह की गर्भवती महिला में मनाया जाता है। सीमन्त के बाद गर्भवती महिला अपने मायके में जाकर ही प्रसूति करवा सकती है। रंडल देवी जिन्हे सूरज देवता की पत्नी मानते हैं, को पूजा और प्रसाद चढ़ाये जाते हैं ताकि वह आने वाले शिशु की रक्षा करें व उसे स्वस्थ्य रखें।

 

केरेला में गोदभराई को पुलिकुड़ी या वायत्तु पोंगल भी बोला जाता है। यह मूल रूप से नायर लोगों में मनाया जाता है। पर अब इसकी प्रसिद्धि अन्य हिन्दू जातियों में भी फैल गयी है। पंडित द्वारा एक शुभ दिन चुना जाता है। उस दिन उसे घर के बने आयुर्वेदिक तेल से मालिश दी जाती है। इसके बाद उसे घर की बुज़ुर्ग औरतों द्वारा नहलाया जाता है। इसके बाद घर में देवी की पूजा की जाती है साथ ही हर्बल दवाइयां गर्भवती महिला को दी जाती हैं।

नाम कुछ भी हो पर इन्हें मनाने का मकसद एक ही है, शिशु व माँ की ख़ुशी। तो आप भी इसे पढ़ें और शेयर ज़रूर करें।

 

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