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जब यू.वी स्तर तीन से कम होता है, तो आमतौर पर धूप से संरक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ती है और कुछ मिनट के लिए सूर्य से सीधा संपर्क शिशु के लिए सुरक्षित और स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। हालांकि ज्यादा समय के लिए शिशुओं को बाहर रखने के दौरान इन बातों की सलाह दी जाती है की जितना हो सके उनके शरीर को कपड़ों से ढकें,हो सके तो उन्हें छांव में रखें। माता-पिता और बच्चों की देखरेख करने वालों को सुझाव दिया जाता है की रोज़ाना धूप से बचाव और बढ़े हुए यू.वी स्तर को जानने के लिए कैंसर काउन्सिल वेबसाइट पर समय और लोकेशन के अनुसार इसका स्तर जांचे।


शिशुओं को सौर यू.वी विकिरणों से संरक्षण देने के लिए कैंसर काउन्सिल आस्ट्रेलिया ने सुझाव दिया है की यू.वी इन्डेक्स का स्तर तीन या तीन से ज्यादा है या नहीं यह जांचने के लिए सन प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करें। अपनी दैनिक गतिविधियों की योजना बनाने से पहले एक बात का ध्यान रखें की शिशु को तेज़ धूप से बचाएं रखें। गर्मियों के दौरान दिन की धूप में जाने से बचें,जब यू.वी स्तर अपने चर्म पर होता है। इसलिए यू.वी इन्डेक्स को जांचिए।


बच्चे अक्सर अपने आसपास की चीजों का अनुकरण करते हैं और उनसे सीखते हैं। शोध से पता चलता है की यदि कोई व्यस्क व्यक्ति धूप से बचाव के तरीकों का पालन करता है, तो जिस शिशु की वह देखरेख कर रहे हैं वह भी यही सीखता है। धूप से संरक्षण के लिए कई उपायों का प्रयोग करें और केवल एक ही उपाय पर पूरी तरह निर्भर ना हो।

शिशु के (pram), स्ट्रोलर और खेलकूद के लिए छाया की जगह ढूंढ़े। यू.वी विकिरणें छाया में भी हो सकती है इसलिए उसमें भी धूप से बचाव के तरीकों का इस्तेमाल करें। गाड़ी की खिड़की को ढकने के लिए कवर का इस्तेमाल करें। (Untitled clear auto glass, side window) यू.वी.बी विकिरणों को 21% तक बंद कर देता है।


ऐसे कपड़ों का इस्तेमाल करें, जो शिशुओं की त्वचा के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को ढकें। आरामदायक, ढ़ीले ढाले और वोवेन फेब्रिक से बने कपड़ों का इस्तेमाल करें। कुछ फेब्रिक में यू.पी.एफ से बचने की क्षमता होती है। जिसकी यू.पी.एफ रेटिंग ज्यादा होगी वह कपड़ा धूप से उतना ज्यादा संरक्षण प्रदान करेगा। ऐसा फेब्रिक चुने जिसका यू.पी.एफ -15 हो या यू.पी.एफ -50 सबसे बेहतर है।


शिशु के मुंह, गर्दन और कानों को संरक्षण देने के लिए (broad brimmed),(bucket),(legionnaire) स्टाइल की टोपियों का इस्तेमाल करें। सही आकार और आरामदायक टोपी चुने। जो टोपी सर पर सही प्रकार से आए,वह सबसे बेहतर होती है। यदि टोपी को बांधने का फीता लम्बा हो, तो उसे सर के पीछे बांधे ताकि वह गले में ना फंसे।

ढकें हुए कपड़े,छाया और टोपी के प्रयोग के बाद धूप से संरक्षण के लिए अंत में सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें क्योंकि छ महीने से कम उम्र के शिशु की त्वचा किसी व्यस्क की तुलना में किसी भी रसायन को तेजी से सोखती है। इसलिए रोज़ाना सनस्क्रीन के उपयोग से दूर रहें। इसके बजाएं तेज धूप में निकलने से बचें और शरीर को सही प्रकार से ढकें और बाकी बचे थोड़े हिस्से पर रिफ्लेकटेनट सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें। बाहर जाने से 15-20 मिनट पहले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें। अगर यह मीट गया हो तो सुनिश्चित करने के लिए की यह असरदार है, दो-दो घंटों में इसे लगाते रहे। इसे जांचने के लिए शिशु की त्वचा के थोड़े से हिस्से में इसे लगाएं।


आंखों के बचाव के लिए AS/NZS 1067:2016 वाले सनग्लासेज का इस्तेमाल करें।जो सही फिटिंग के हो और आंखों के अधिकतर हिस्से को ढकते हो। शिशुओं के लिए आने वाले सनग्लासेज में मुलायम इलास्टिक होता है,जो उसे जगह पर बनाए रखने में मदद करता है खिलौने या फैशनेबल ग्लासेज को धूप से बचाव के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

छाया,टोपी, ढकें हुए कपड़े, सनग्लासेज का प्रयोग शिशुओं को हानिकारक यू.वी विकिरणों से बचाने के लिए करें।

सनस्क्रीन का प्रयोग

सनस्क्रीन दो तरीकों से काम करती है–


1 . यू.वी विकिरणों को त्वचा तक पहुंचने से रोकना और उसे दूर फेंकना। इसे रिफ्लेक्टेंट या फिजिकल सनस्क्रीन कहते हैं, जैसे जिंक ओक्साइड और टाइटेनियम डाइओक्साइड। रिफ्लेक्टेंट सनस्क्रीन त्वचा पर लगाने पर हल्की दूधिया सफेद होती है।

2 . यू.वी रेडिएशन को सोखना, लेकिन त्वचा की कोशिकाओं में जाने से रोकना। यह रसायनिक सनस्क्रीन कहलाती है और आमतौर पर कृत्रिम रसायनों के मिश्रण जैसे (cinnamates,dibenzoylmethanes, benzophenone) आदि होते हैं। यह सनस्क्रीन त्वचा पर लगाने के बाद दिखाई नहीं देते हैं।

आस्ट्रेलेशियन कालेज आफ ड्रमटालोजिस्ट यह सुझाव देते हैं की छ महीने से कम उम्र के शिशुओं को रसायनिक सनस्क्रीन नहीं लगाना चाहिए क्योंकि उनकी त्वचा किसी व्यस्क की त्वचा की तुलना में ज्यादा जल्दी इन रसायनों को सोखती है। हालांकि ढकें हुए कपड़े, टोपी और सनग्लासेज के बाद बचें हुए हिस्से में रिफ्लेक्टेंट सनस्क्रीन इस्तेमाल किया जा सकता है।


कुछ शिशुओं की त्वचा में सनस्क्रीन से थोड़ी समस्या होती है। लेकिन पूरी तरह कोई एलर्जी होने की संभावना कम होती है लेकिन उत्पाद में मोजूद प्रिजर्वेटिव और प्रफ्यूम से एलर्जी हो सकती है।

सनस्क्रीन क्रीम जो आमतौर पर संवेदनशील त्वचा के लिए बनाई गई होती है, उसमें टाइटेनियम डाइओक्साइड और जिंक ओक्साइड होता है, इसमें अल्कोहल या फ्रेगरेंस की मात्रा ना के बराबर होती है जो त्वचा को नुक्सान पहुंचा सकती है। इसलिए शिशु के त्वचा के थोड़े से हिस्से में इसे लगाएँ और जांचे की इससे कोई समस्या तो नहीं है इसमें 48 घंटे लगते हैं। यदि कोई समस्या दिखाई देती है, तो फौरन डॉक्टर से सलाह लें।

विटामिन डी


धूप में कम बाहर जाने से विटामिन डी की कमी हो सकती है। जब त्वचा यू.वी रेडिएशन के संपर्क में आती है तो विटामिन डी का उत्पादन होता है जो स्वस्थ हड्डियों और मांसपेशियों के विकास के लिए जरूरी है।

विटामिन डी की कमी से लगातार बीमार रहना यह शिशुओं में माताओं से भी आता है, जो विटामिन डी की कमी से ग्रस्त होती है। हालांकि विटामिन डी रोजाना सीर्फ कुछ समय धूप के संपर्क में रहने से उत्पादित होता है इसलिए बिना धूप से बचाव के ज्यादा समय धूप में रहना सही नहीं होगा। अगर शिशु में विटामिन डी की कमी है, तो डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

नैपी रैशेस


नैपी रैशेस में शिशु के कूल्हों और नितंब का हिस्सा, रैशेस होने से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है। रैशेस नैपिज में मल या मूत्र के कारण होने वाली नमी की वजह से होते है। इससे बचाव के लिए नैपी को समय पर बदलते रहें और प्रभावित हिस्से में क्रीम लगाएँ और उसे जितना हो सके खुली हवा में रखें। नंगे शिशु को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सीधे धूप में ले जाने से उन्हें सनबर्न की समस्या हो सकती है इसलिए ऐसा ना करें

पीलिया


नवजात शिशुओं में पीलिया आमतौर पर केवल 10% शिशुओं में चिंता का विषय होता है। पीलिया का इलाज सही चिकित्सकीय देखरेख में किया जाना चाहिए। नवजात शिशुओं में पीलिया के दौरान उन्हें सीधा धूप के संपर्क में लाना सही नहीं होता है।

इसे पढ़े, समझें और शेयर करें, शायद आपके एक शेयर से किसी माँ को अपने बच्चे की सेहत के लिए धुप के फायदे पता चल जाएँ| 

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