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नवजात शिशु परीक्षण के बारे में आप जानना चाहती होंगी। इससे जुड़े सवालों के जवाब हम आपको इस पोस्ट में बातएंगे।

newborn screening test = नवजात शिशु परीक्षण क्या होता है?

इस टेस्ट में जिन बच्चों का जन्म हुआ है उन्हें किसी भी प्रकार के गंभीर रोग के लिए जाँचा जाता है। ज्यादातर बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ्य होते हैं परन्तु एक-आद बच्चे अगर गलती से किसी रोग की चपेट में आ जाते हैं तो उनको ठीक करने के लिए सही इलाज किया जाता है। इसे बच्चे के स्वस्थ्य दिखने के बावजूद किया जाता है। क्योंकि कई बीमारियाँ अंदरूनी होती हैं और बाहरी रूप से नज़र नहीं आती। इसलिए बीमारियाँ जल्दी पकड़ में आने से इन्हें बढ़ने से रोका जा सकता है साथ ही इनका दुष्प्रभाव शिशु पर ज़्यादा देर नहीं रहेगा।

शिशु की जाँच कब की जाती है?

शिशु के पैदा होने के 24 घंटे के अंदर डॉक्टर आपके शिशु का रक्त सैंपल लेंगे और उसकी जाँच करेंगे। इसके नतीजे जल्द से जल्द लेकर आप तक पहुंचा दिए जायेंगे।

शिशु की जाँच कहाँ की जायेगी?

शिशु की जाँच होस्पितल में नर्स या डॉक्टर द्वारा की जाएगी। आप अगर हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दी गयीं हैं तो इसके लिए आपको दोबारा हॉस्पिटल बुलाया जा सकता है। अगर आपने शिशु को घर पर जन्म दिया है तो शिशु को जांच के लिए हॉस्पिटल ले जाना होगा। इसके लिए आपको 2 से 3 दिन के अंदर शिशु का रक्त सैंपल दे देना चाहिए।

क्या इन टेस्ट से शिशु को दर्द पहुंचता है?

जी नहीं। यह टेस्ट्स विशेषज्ञ द्वारा किये जाते हैं, जिन्हे बहुत तजुर्बा होता है।

शिशु की जाँच कैसे की जाती है?

शिशु के रक्त परीक्षण के लिए एक सुई से थोड़ा सा खून निकाला जाता है। शिशु की सुनने की शक्ति जाँचने के लिए एक मुलायम ear phone शिशु के कान में रखा जायेगा। यह अस्थ्याई होता है और टेस्ट के बाद निकाल दिया जाता है। शिशु के ह्रदय में कोई विकृति नही है इसके लिए उसकी छाती की त्वचा में सेंसर लगाए जाते हैं। इससे शिशु की pulse और ह्रदय तक कितना oxygen जा पा रहा है इसे माप लिया जाता है। इन टेस्टों में शिशु अक्सर सो रहा होता है। उसे पता भी नही चलता है।

शिशु परिक्षण से कौन से और किस प्रकार के रोगों का पता लगाया जा सकता है?

newborn screening test के माध्यम से शिशु में निन्मलिखित रोगों की परख हो जाती है। उदाहरण:

1. phenylketonuria -इस बीमारी में शिशु का बदन सही ढंग से भोजन पचा पा रहा है यह जाँचा जाता है। इसमें शिशु का मेटाबोलिज्म परखा जाता है।

2. congenital hypothyroidism- इस बीमारी में शिशु की थाइरोइड ग्लैंड सही ढंग से हॉर्मोन पैदा कर रही है इसकी जाँच की जाती है।

3. galactosemia- इस बीमारी में शिशु का बदन दूध को पचाने में सक्षम है यह पता लगाया जाता है। दूध को पचाने में एक विशेष एंजाइम की ज़रूरत होती है। इसके अभाव में शिशु का बदन galactose तो glucose में नहीं तब्दील कर पाता जिस कारण उसके हाजमे में परेशानी आ जाती है। इस स्थिति में शिशु को दूध और उससे बनी चीज़ों से दूर रखना पड़ता है।

4. sickle cell disease- इसमें red blood cells का आकार देखा है। उन्हें सामान्यतः गोल होना चाहिए। अगर वे आधे चाँद के आकार में हुए तो फिर शिशु को नया रक्त पैदा करने में दिक्कत होगी।

5. Biotinidase Deficiency- इस परीक्षण में शिशु में Biotinidase एंजाइम की मात्रा चेक की जाती है। इस एंजाइम की कमी से शरीर विटामिन बी( biotin) को पचा नहीं पाता है। इसके अभाव में बदन में paralysis (लकवा) हो सकता है, मांसपेशियों में सामंजस्य नहीं बैठता, रोग-प्रतिरोधक शक्ति कम हो होती है, दिमागी विकास थम जाता है। समय रहते जांच होने पर शिशु का इलाज हो जाता है। फ़िक्र की बात नहीं है।

6. Congenital Adrenal Hyperplasia (CAH)- इस रोग में बदन की adrenal ग्रंथि की जाँच की जाती है। वह ज़रूरत से ज़्यादा होर्मोनस न पैदा करे यह प्रयास किया जाता है। अगर एड्रेनल ग्लैंड में गड़बड़ी हुई तो शिशु के शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का लेवल बिगड़ जाता है।

7. Maple Syrup Urine Disease (MSUD)- इस बीमारी से शिशु की मूत्र का परिक्षण किया जाता है। उसकी गंध मीठी सिरप की तरह लगती है या फिर जली चीनी सी लगती है। ऐसा इसलिए क्योंकि amino acid पचाने वाले एंजाइम के अभाव मे शिशु का बदन amino acids को पचा नही पाता है। इस प्रकार के बच्चों में भूख नहीं लगती और चिड़चिड़े होते हैं।

चिंता न करें। यह सिर्फ टेस्ट के नाम हैं जो किये जाते हैं। यह आपके शिशु की सेहत के लिए ही किये जाते हैं ताकि वक्त रहते वह बढ़ने न पाए और शिशु को दिक्कत न हो। इसको अन्य माताओं तक शेयर करें ताकि वे भी इन्हें जाने।

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