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गौरी माँ जिन्हे हम माँ पारवती के नाम से भी जानते हैं, गणेश जी की माँ हैं। यह पूजा मुख्य रूप से महाराष्ट्र में मनाई जाती है। इसके आस पास के इलाकों में भी इसे मनाया जाता है। इस दिन की ख़ास बात यह है की महिलायें सारी रात जगती हैं और पारम्परिक खेल खेलती हैं जैसे की ज़िम्मा और फुगड़ी।

गौरी पूजन महिलाओं के लिए क्यों ख़ास होता है?

हिन्दू मान्यता के मुताबिक जिस प्रकार नर ईश्वरों को इज़्ज़त दी जाती है उसी प्रकार स्त्री देवियों को भी पूजना चाहिए। इसीलिए माता पारवती की पूजा गणेश उत्सव के बाद की जाती है ताकि उनकी कृपादृष्टि हर माँ का सुखी और तंदरुस्त रखे।

गौरी पूजा पर महिलाएं क्या कर सकती हैं?

इस पूजा में घर में गौरी माँ की मूर्ति लाई जाती है।

माता की मूर्ति की श्रद्धा से पूजा की जाये तो वह भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं और उनके दुःख दर्द हर लेती हैं।

गौरी माँ की मूर्ति को सुन्दर साड़ियों में सजाया जाता है। उन्हें हरी चूड़ियाँ, मंगलसूत्र, नथ और गले के हार पहनाये जाते हैं। यह वही श्रृंगार वस्तुएं हैं जिन्हे विवाहित महिलाएं भी पहनती हैं।

गौरी माँ को सर पर फूलों का हार जिसे मराठी में “वेणी” बोलते हैं पहनाया जाता है।

गौरी पूजन और महिलाएं

पूजा के लिए पुजारी को बुलाया जा सकता है या फिर घर के सदस्य पूजा कर सकते हैं। माता को नारियल, चुनरी का टुकड़ा, फूल, केले, चावल और नई साड़ी भी पहनाई जा सकती है।

दिन के रीति-रिवाज़ पूरा करने के बाद महिलाएं रात में मंगल गौरी के गीत गाती हैं। इसमें पुरुष हिस्सा नहीं लेते।

यह पूजा नवविवाहिता स्त्री के लिए शुभ माना जाता है।

पूजा पूरी होने के बाद माता की मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता है। यह लगभग गणेश चतुर्थी के छठे या सातवे दिन किया जाता है।

विसर्जन पूर्व गौरी माँ की मूर्ति की आरती की जाती है। पके हुए चावल को मेथी पत्तों और दही के साथ मिश्रित करके माँ को चढ़ाया जाता है। यह प्रसाद अन्य भक्तों में दान कर दिया जाता है।

गौरी माँ की भक्ति आपके शिशु और होने वाले शिशु को विपदाओं से दूर रखेगी।

त्यौहार के बहाने घर में सभी लोग एक दूसरे से मिल लेते हैं, हंसी-मज़ाक होता है और आपस में प्यार बाँटते हैं। आप भी इस पोस्ट को अपने प्रियजनों में बाँटे और माँ का आशीर्वाद प्राप्त करें।

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