प्रेगनेंसी में नार्कोलेप्सी- दिन के समय बहुत नींद आने के दस कारण

नार्कोलेप्सी (दिन के समय अधिक सोना) के दस कारण।

कल्पना कीजिए कि आप किसी से बात करते हुए अचानक सो जाएं या गाड़ी चलाते हुए आपको नींद आ जाए। नार्कोलेप्सी का यही मतलब होता है। अगर आपको भी यह न्यूरोलोजिकल समस्या है, तो आपका मस्तिष्क आपके चलने और सोने के पैटर्न को ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता है। सामान्य नींद के चक्र वाले लोगों में, रैपिड आइ मूवमेंट (REM, सपने का दौर) 60 – 90 मिनट के बाद होता है और इसमें मांसपेशियां शक्तिहीन हो जाती है, जिससे वह सपने से बाहर नहीं निकल पाती है। लेकिन नार्कोलेप्सी वाले, लोगों में (REM, सपने का दौर) सोने के 15 मिनट के अंदर शुरू हो जाता है। साथ ही सपनों की गतिविधि और मांशपेशियों की कमजोरी, जागने के बाद भी बनी रहती है।

इसमें दिन में अधिक सोना, नींद का दौरा, अचानक नींद आ जाना, सपने में लकवा मारना, सोने और चलने के दौरान ज्वलंत मतिभ्रमण (विविड हलूक्यूनेशन) आदि इसके लक्षण है। आप केटापिलेक्सि और थोड़े समय के लिए मांसपेशियों की कमजोरी और उससे नियंत्रण भी खो सकते हैं। नार्कोलेप्सी आपका सामाजिक, कामकाजी, अकैडमिक और सामान्य जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।

तो वास्तव में नार्कोलेप्सी के क्या कारण है? हालांकि हम अभी तक इस स्थिति को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं, शोधकर्ताओं का मानना है की निम्न कारकों का समागम इसके लिए जिम्मेदार होता है–

1. हाइपोक्रेटिन का कम स्तर 

नार्कोलेप्सी से ग्रस्त लगभग सभी व्यक्ति कैटलैक्स के लक्षण का अनुभव करते हैं, कम स्तर के न्यूरोट्रांसमीटर को हाइपोक्रेटिन के तौर पर जाना जाता है, जो (REM, सपने का दौर), नींद को नियंत्रित करता है और जागने की सक्रियता बढ़ाता है। हालांकि हाइपोक्रेटिन का स्तर आमतौर पर उन लोगों में सामान्य होता है,जो बिना कैटलैक्स की नार्कोलेप्सी से पीड़ित होते हैं।

2 खराब प्रतिरक्षा तंत्र

जब प्रतिरक्षा तंत्र सही प्रकार से कार्य कर रहा होता है, तो वह हानिकारक टोक्सिन और जर्म्स से संरक्षण के लिए एंटिबोडिज छोड़ता है। लेकिन कभी-कभार प्रतिरक्षा तंत्र गलती से स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों पर आक्रमण करता है। प्रतिरक्षा प्रणाली की यह दोषपूर्ण प्रतिक्रिया ओटोइम्यून प्रतिक्रिया के रूप में जानी जाती हैं। और इसे नार्कोलेप्सी में अहम भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है। इस स्थिति के साथ कुछ लोग ट्रिब-2 के प्रति एंटिबोडिज बनाते हैं, प्रोटीन भी दिमाग के उसी हिस्से में बनता है, जहां हाइपोक्रेटिन बनता है। इसलिए प्रतिरक्षा तंत्र, दिमाग की उन कोशिकाओं पर हमला करता है, जहां हाइपोक्रेटिन होता है और कम स्तर के न्यूरोट्रांसमीटर का कारण बनता है।

3. जीन में बदलाव 

वैज्ञानिकों ने ऐसे जीन का पता लगाया है, जिनसे नार्कोलेप्सी के प्रभाव का जोखिम होता है। इस जीन को HLA-DQB1 के नाम से जाना जाता है, जिसमें आपके प्रतिरक्षा तंत्र की सही कार्य करने के लिए प्रोटीन बनाने की जानकारी होती है,जो कि महत्वपूर्ण है। इस जीन को ह्यूमन ल्यूकोकाइट एंटीजन के रूप में जाना जाता है,जो आपके प्रतिरक्षा तंत्र को जर्म्स और आपके शरीर से बने प्रोटीन को पहचानने में मदद करता है। HLA-DQB1 जीन के सामान्यत कई रूप होते हैं, जो आपके प्रतिरक्षा तंत्र में आने वाले बाहरी प्रोटीन का सामना करते है। इसे नार्कोलेप्सी से जोड़ा जाता है, खासतौर पर जब यह कैटपलैक्स या निम्न स्तर के हाइपोक्रैटिन की वजह से हो।

4. अनुवांशिक कारण

हालांकि नार्कोलेप्सी के अधिकतर मामलों में इसका कोई पारिवारिक इतिहास नहीं था, लगभग दस प्रतिशत लोगों में ही ऐसे नजदिकी रिश्तेदार थे,जो नार्कोलेप्सी के साथ कैटपिलैसी से पीड़ित थे।और यह देखा जाता है की सामान्य लोगों की तुलना में जिनके माता-पिता या भाई-बहन को यह समस्या हो, उन्हें इस बीमारी के होने की 40% अधिक संभावना होती है।

5. दिमागी चोट

कभी-कभार नार्कोलेप्सी किसी खतरनाक दिमागी चोट से भी हो सकती है। ब्रेन ट्यूमर, मल्टिपल स्केलेरोसिस, एन्सेफेलाइटिस, दिमाग को प्रभावित करते हैं और ऐसा आपके दिमाग में लगी चोट या क्षति के कारण होता है, जो आर.ई.एम और जागने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

6. स्वाइन फ्लू जैसे संक्रमण के कारण

कुछ लोगों में स्ट्रेप्टोकोकल और स्वाइन फ्लू जैसा संक्रमण नार्कोलेप्सी का कारण बनता है। संक्रमण से आटोइम्यून हाइपोक्रेटिन न्यूरोन के प्रति प्रतिक्रिया देता है।

7. मानसिक तनाव 

एक अध्ययन में नार्कोलेप्सी होने के एक साल पूर्व की गतिविधियों को देखा गया और पाया गया कि तनावपूर्ण स्थिति से लोगों में यह बीमारियां होती है। साथ ही सामान्य लोगों की तुलना में इनमें अधिक तनाव पाया गया है।

8. हार्मोनल बदलाव 

मीनोपौज और किशोरावस्था के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव भी नार्कोलेप्सी को बढ़ावा देते हैं।

9. नींद लेने की आदतों में गड़बड़ी 

अचानक सोने की आदतों में बदलाव,चाहे वह शिशु की देखभाल, काम की शिफ्ट या बीमार व्यक्ति की वजह से हो, यह नार्कोलेप्सी को प्रभावित करते हैं।

10. पर्यावरण में व्याप्त टोक्सिन

कुछ शोधों में पाया गया है कि पर्यावरण में व्याप्त टोक्सिन भी नार्कोलेप्सी का कारण बनते हैं। भारी मैटल,पैस्टेसाइड,विड और धूम्रपान इसे बढ़ाता है।

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