शिशु के सम्पूर्ण विकास में घर के माहौल व पति-पत्नी के आपसी प्रेम का महत्व

   शिशु के जन्म के बाद उसको कब स्तनपान कराएं, कब उसका नैप्पी बदलें, कब उसको सुलायें, कहाँ और कैसे सुलायें इन सभी बातों पर तो ध्यान दिया जाता है। लेकिन क्या इनके अतिरिक्त घर के माहौल और पति-पत्नी उनके आपसी सम्बन्ध की भूमिका समझ पाये हैं?

 

जिस प्रकार शिशु गर्भ में माँ की हरकतों, खानपान और मूड से प्रभावित होता है, उसी प्रकार जब उसका जन्म होता है तो आराम और आहार तो उसको प्रभावित करते ही हैं, साथ ही बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका उसके घर का माहौल यानि की माँ-बाप का रिश्ता भी निभाता है।

इस पोस्ट में हम आपको आपके वैवाहिक जीवन में मिठास का महत्व और उसे बनाये रखने के लिए टिप्स भी देंगे।

सुखी दंपत्ति अपने बच्चे पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।

जिन पति-पत्नी में स्वस्थ्य वार्तालाप होता है, उनमें बच्चे को लेकर भी ज़रूरी विषयों पर बातचीत होती है। इंसान सुखी होता है तो उसका काम में मन लगता है, साथ ही वह ज़रूरी चीज़ें भी भूलता नहीं।

सुखी दंपत्ति की सकारात्मक ऊर्जा बच्चे को स्वस्थ्य रखती है

शिशु कैसा भी हो परन्तु घर की खुशहाली बच्चे को भी हंसमुख इंसान बनाती है। वे हर किसी की गोद में मुस्कुराते हैं, और उनके साथ खेलने में मज़ा आता है। उनके समपर्क में आने वाले इंसान में भी पोसिटिव एनर्जी का संचार होता है।

पति पत्नी एक-दूसरे को सम्मान देते हैं तो बच्चे को अन्य लोगों का आदर करना भी आता है

बच्चा अपने आस-पास के माहौल को बेहतर ग्रहण करता है। इसलिए उसको यह शिक्षा देना की सबका सम्मान करो, अंकल-आंटी से चिढ़ो मत से अच्छा है की पति-पत्नी खुद बच्चे से धीमी आवाज़ में बात करें, आपसी मतभेद को शिशु के सामने न ज़ाहिर करें ताकि बच्चा गलत आदतें पहले न सीखें।

शिशु के अच्छी मानसिक व शारीरिक सेहत के लिए

माँ-बाप आपस में प्यार से रहते हैं तो इससे बच्चे की सेहत पर भी अनदेखा प्रभाव पड़ता है। यकीन मानें आपका बच्चा अगर बीमार पड़ जाए तो भी घर में स्नेह की खुशबु उसको निरोगी होने में मदद करती है।

हम आशा करते हैं की आप सभी बच्चे की परवरिश में केवल माँ को ही ज़िम्मेदारी न दें। इसमें बच्चे के पिता का भी योगदान देना ज़रूरी है। उसे पत्नी का हमसफ़र होने के नाते शिशु की पारवरिश में भागीदार होना चाहिए।

इसे शेयर करना न भूलें और अपने पति को टैग करें।

Leave a Reply

%d bloggers like this: