दहेज़ या पिता का उपहार – क्या इसमें है ससुराल वालों का अधिकार?

  एक पिता और एक बेटी का रिश्ता ऐसा होता है की दोनों एक दूसरे के लिए सबकुछ न्योछावर कर सकते हैं। अग्नि से पवित्र इस रिश्ते की क्या कमज़ोरी है यह दहेज़? पिता का बेटी की तरफ प्रेम का क्या लोग फायदा उठाना चाहते हैं?

असल बात तो यह ही है की पिता अपनी पुत्री को हर परिस्थिति में सुखी देखना चाहते हैं। नाज़ों से पली अपनी फूल जैसी पुत्री पर कैसे वह कभी ऊँगली उठते हुए देख सकते हैं? पिता अपनी बेटी को हर तरीके से मज़बूत देखना चाहते हैं। वह नहीं चाहते की उनकी बेटी को किसी भी रूप में बोझ समझा जाये। परिणामस्वरूप वह जो बन पाए हसी ख़ुशी कर बैठते हैं। फिर चाहे उसे पिता का अटूट प्यार कहें या दहेज़?

आप सोच रहे होंगे की यह कैसी तुलना है? जी हां, सच सुना आपने। आइये इस बात की गहराई में देखते हैं –

भारतीय संस्कृति

क्या यह दहेज़ प्रथा हमेशा से भारत संस्कृति में थी? क्या भारतीय संस्कृति में हमेशा से औरतों का स्तर इतना नीचे था?

दूसरे तरफ देखा जाए तो भारत वह देश मानागया है जहाँ औरतों तो सर्वोत्तम सम्मान दिया जाता है।भारतीय संस्कृति के सबसे शक्तिशाली भगवानों में देवियों को पूजा जाता है। जिस देश में विद्या की देवी सरस्वती, शक्ति की देवी दुर्गा और धन की देवी लक्ष्मी को माना गया है, उस देश में कैसे स्त्रियों को यह स्तर दिया गया होगा?

यहाँ तक हमारी संस्कृति में तो मना जाता है की स्वयंवर का रिवाज़ था। इसका मतलब यह है की स्त्रियों के पास यह अधिकार था की वह खुद का जीवन साथी चुनें। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ जो दहेज प्रथा का आरम्भ हुआ?

दहेज़ प्रथा कैसे और कब शुरू हुई?

यह शुरू हुआ जब अंग्रेजों ने भारत में स्त्रियों से धन – संपत्ति रखने का अधिकार छीन लिया। पहले पिता अपने पुत्री को धन – संपत्ति उपहार स्वरुप देते थे। यह एक प्यार की नीशानि थी और यह सम्पत्ति यह निश्चित करती थी की उनकी पुत्री किसी पर भी निर्भर न रहे। स्त्रियों का अपना सम्मान होता था।

फिर अंग्रेजों ने यह कानून निकाला की महिलाओं की संपत्ति पूरी तरीके से उनके पति की होगी। वह खुद के नाम पर कुछ नहीं रख सकती। यहाँ से शुरुवात हुई लालच भरी इस प्रथा की। लोग स्त्रियों को धन से तोलने लगे।दुल्हन को कमाई का जरिया बना लिया गया।प्यार भरा पिता का उपहार अब दहेज़ बन गया।

क्या यह आज किसी और रूप में हो रहा है?

देखा जाए तो तब की बात अलग थी। तब स्त्रियां शिक्षा से अक्सर वांछित रहती थी।ज़िन्दगी भर वह अपने पिता के घर में सहायक की तरह रहती थीं। तब पिता अपनी पुत्री की ससुराल में सुरक्षा हेतु संपत्ति उपहार में देते थे।

पर क्या आज भी यही अमल होना चाहिए?

एक पुत्री होने के नाते हम आज समझ सकते हैं की बचपन से हमें पिता एक बेटे की तरह पालन पोषण करते हैं।ज़रुरत की चीज़ों और शौक से लेके उच्च स्तर की शिक्षा तक, हमें क्या कुछ प्रदान नहीं करते। फिर यह कैसा न्याय? शादी में सुरक्षा हेतु क्यों वह अब अपनी जीवन की पूँजी हमें दें जब उन्होनें हमें इस काबिल बना ही दिया है की हम अपना मान रखें।

क्या आज भी उपहार के नाम पर पिता के सर पर बूझ है? क्यों आज भी ससुराल वालों को बहुओं से उम्मीद होती है? क्यों आज भी महिलाओं के धन लाने पर सास ठाट दिखाती है? यह एक पिता और पुत्री के बीच का मुद्दा होना चाहिए। पुत्री प्रेम में उन्हें जो देना है जितना देना है वह उनकी मर्ज़ी है, इसमें ससुराल वालों की कोई दखलंदाज़ी नहीं होनी चाहिए।इसमें ससुराल वालों का कोई अधिकार नहीं हैं। यह बहु की संपत्ति है और इसमें वह जिसे चाहे अपनी भागीदार बना सकती है।

उपहार वह होता है जो दिल से बिना बोझ से दिया और लिया जाए। फिर ऐसे उपहार को शर्त बनाकर दाहेज जैसी कुप्रथा न सम्बोधित करें।

आखिरी में मुझे बस यह कहना है कि बेटियों का पूरा अधिकार है अपने माँ- पिता से उपहार लेने का लेकिन उस उपहार में सिर्फ उनका ही अधिकार है। ससुराल वालों की नाम पर जबरदस्ती यह उपहार देना दहेज़ कहलाता है जिसका हम बेटियां कहे दिल से विरोध करेगी।

 

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