भारत का पहला गर्भाशय (यूट्रस) ट्रांसप्लांट: मां ने किया बेटी को अपना गर्भाशय दान

 मई में एक खबर बहुत चर्चित रही, एक भारतीय मां ने अपनी बेटी को अपना गर्भाशय दान किया। यह भारत में इस प्रकार की पहली सर्जरी है और विश्व में ऐसी तीसवीं मेडिकल सर्जरी है।

इस पूरे आपरेशन में साढ़े नौ घंटे लगे और यह पूने गैलेक्सी केयर अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. शैलेश पंटाम्बेकर की देखरेख में किया गया। उनका कहना है की “ यह प्रक्रिया मुश्किल थी क्योंकि बड़ी मल्टिपल आर्टिरज को वहां जोड़ना था,और वेन्स बहुत छोटी थी… यह तकनीकी रूप से बहुत मुश्किल था।”

पहला गर्भाशय ट्रांसप्लांट 2014 में किया गया था और यह डॉ. मैटस ब्रानसट्राम की देखरेख में किया गया था। उन्होंने इसपर कई दशकों से शोध किया था। गर्भाशय ट्रांसप्लांट द्वारा केवल छह शिशुओं को जन्म दिया जा सका था। ग्यारह असफल प्रयासों के बाद,एक स्वस्थ शिशु को स्वीडन में जन्म दिया गया था। इसी के साथ अन्य पांच डिलीवरी भी इसी टिम द्वारा स्वीडन में की गई थी।

 एब्सलयूट यूट्राइन इनफर्टिलिटी बहुत ही दुर्लभ स्थिति है,जो 500 में से एक महिला को प्रभावित करती है। यह कुल-मिलाकर दुनिया भर में महिलाओं की 1.5 मिलियन संख्या है। गर्भाशय ट्रांसप्लांट के बाद महिला गर्भधारण के लिए एक वर्ष तक का इंतजार करती है। यह इसलिए होता है ताकि शरीर नए गर्भाशय को अस्वीकार ना करे।

यह प्रक्रिया (IVF) द्वारा शुरू होती है, जहां मां के अंडों को स्पर्म के साथ निषेचित किया जाता है और परिणामस्वरूप आए गर्भ को जमा दिया जाता हैं। यह गर्भाशय ट्रांसप्लांट के एक साल बाद गर्भाशय में स्थापित किया जाता है।

इसके बाद पूरी गर्भावस्था के दौरान मां की देखभाल डॉक्टर की निगरानी में की जाती है। अपनी इच्छा के अनुसार बच्चों का गर्भधारण करने के बाद, डॉक्टर दान दिए गए गर्भाशय को हटा देते हैं। यह इसलिए किया जाता है ताकि प्राप्तकर्ता को इम्यूनोसूपरेसिव ड्रग लेने की जरूरत ना हो।

 डॉ. ब्रानसट्राम कहते हैं इस प्रक्रिया को पूरी तरह क्लीनिकल प्रक्रिया बनाने के लिए और शोध की आवश्यकता है। इसमें 3-5 साल लगेंगे। आने वाले वर्षों में यह प्रक्रिया सिर्फ उन माताओं के लिए नहीं होगी जिन्हें गर्भाशय में कोई तकलीफ़ है या बीमारी है लेकिन उन ट्रांसजेंडर महिलाओं के लिए भी होगी,जो गर्भधारण करना चाहती है।

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